सप्तचक्र (Seven Chakras): Complete Ancient Guide to Energy Centers
An exhaustive guide to the सप्तचक्र (Seven Chakras) — Muladhara, Svadhisthana, Manipura, Anahata, Vishuddha, Ajna, and Sahasrara — with Sanskrit Bija mantras, locations, and classical scriptural roots.

सातों चक्रों और सुषुम्ना नाड़ी का सामान्य आरेख। (Wikimedia Commons, CC0)
मानव शरीर की सूक्ष्म संरचना — जिसे योग-दर्शन में "सूक्ष्म शरीर" (सूक्ष्म शरीर, subtle body) कहा जाता है — में सात प्रमुख ऊर्जा-केंद्रों, यानी चक्रों, का वर्णन तंत्र और हठयोग परंपरा में सदियों से मिलता है। "चक्र" शब्द संस्कृत की धातु "चक्" से आया है, जिसका अर्थ है घूमना — अर्थात एक घूर्णनशील ऊर्जा-चक्र या पहिया। यह लेख हमारी सप्त-चक्र श्रृंखला का पहला और सबसे विस्तृत भाग है, जिसमें हम पूरी प्रणाली — इसका इतिहास, दर्शन, संरचना, साधना-पद्धति, और इससे जुड़े आधुनिक दावों की सच्चाई — को गहराई से समझेंगे। अगले सात लेखों में हम हर एक चक्र को अलग-अलग, और भी अधिक विस्तार से समझेंगे। यह पूरी श्रृंखला लगभग 4 घंटे के गहन अध्ययन की सामग्री है — इसे धीरे-धीरे, एक-एक भाग करके पढ़ना बेहतर रहेगा।
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चक्र शब्द की व्युत्पत्ति और सूक्ष्म शरीर की अवधारणा
भारतीय दर्शन में शरीर को केवल स्थूल (भौतिक, हाड़-मांस का) शरीर तक सीमित नहीं माना जाता। वेदांत और सांख्य-योग परंपरा में शरीर की तीन परतें बताई गई हैं: स्थूल शरीर (physical body), सूक्ष्म शरीर (subtle/energy body, जिसमें प्राण, मन, और नाड़ी-तंत्र शामिल हैं), और कारण शरीर (causal body, जो कर्म-संस्कारों का बीज-रूप है)। चक्र इसी सूक्ष्म शरीर का हिस्सा माने जाते हैं — न कि स्थूल शरीर के किसी अंग विशेष का। यह भेद समझना अत्यंत ज़रूरी है, क्योंकि आधुनिक लोकप्रिय साहित्य में अक्सर चक्रों को सीधे भौतिक अंगों या ग्रंथियों से जोड़ दिया जाता है, जबकि मूल परंपरा में यह जोड़ नहीं मिलता (इस पर हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे)।
सूक्ष्म शरीर के भीतर एक जटिल नाड़ी-तंत्र (energy channel network) माना जाता है। हठयोग ग्रंथों — जैसे "हठयोग प्रदीपिका" और "शिव संहिता" — के अनुसार शरीर में कुल 72,000 नाड़ियां होती हैं, जिनमें से तीन सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती हैं: इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना। चक्र इन्हीं नाड़ियों, विशेषकर सुषुम्ना, के साथ स्थित ऊर्जा-संगम बिंदु माने जाते हैं।
स्रोत: यह ज्ञान कहां से आया?
चक्र-प्रणाली का कोई एक भी "मूल" स्रोत नहीं है — यह सदियों में विकसित हुई एक परंपरा है। इसके प्रारंभिक संकेत उपनिषदों (जैसे योग-चूड़ामणि उपनिषद, जो चक्रों और कुंडलिनी का उल्लेख करता है) और प्रारंभिक तंत्र ग्रंथों में मिलते हैं। लेकिन सात चक्रों की वह विशिष्ट, सुव्यवस्थित प्रणाली जो आज सर्वाधिक प्रचलित है, सात चक्रों की सबसे प्रचलित प्रणाली मुख्यतः 16वीं सदी के बंगाली तंत्र ग्रंथ "षट्चक्रनिरूपण" (पूर्णानंद यति रचित) पर आधारित है, जिसे सर जॉन वुडरॉफ (उपनाम "आर्थर अवलोन") ने 1919 में अंग्रेज़ी में "The Serpent Power" नाम से अनूदित कर पश्चिमी जगत में प्रसिद्ध किया।
षट्चक्रनिरूपण मूलतः एक स्वतंत्र ग्रंथ नहीं, बल्कि पूर्णानंद के बड़े तंत्र-ग्रंथ "श्रीतत्त्वचिन्तामणि" के छठे अध्याय का शीर्षक है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसमें केवल छह चक्रों (मूलाधार से आज्ञा तक) का विस्तृत वर्णन है — सहस्रार को ग्रंथ स्वयं "छठे चक्र से परे" के लक्ष्य के रूप में वर्णित करता है, इसीलिए ग्रंथ का नाम "षट्चक्र" (छह चक्र) है, "सप्तचक्र" नहीं। सर जॉन वुडरॉफ, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और संस्कृत के गंभीर विद्वान थे, ने बांग्ला पंडित शिव चंद्र विद्यार्णव की सहायता से इस ग्रंथ का अंग्रेज़ी अनुवाद और विस्तृत टीका तैयार की, जो 1919 में "द सर्पेंट पावर" शीर्षक से प्रकाशित हुई। इसी पुस्तक ने पश्चिमी जगत में चक्र-ज्ञान की नींव रखी — इससे पहले पश्चिम में इस विषय पर कोई गंभीर अकादमिक कार्य उपलब्ध नहीं था।
कुंडलिनी और सुषुम्ना: पूरी प्रणाली का आधार
तंत्र और हठयोग परंपरा के अनुसार, रीढ़ की हड्डी के आधार पर एक सुषुम्ना नामक केंद्रीय सूक्ष्म नाड़ी होती है, जिसके साथ इड़ा (चंद्र नाड़ी, बायीं ओर, शीतल/निष्क्रिय ऊर्जा की प्रतीक) और पिंगला (सूर्य नाड़ी, दायीं ओर, उष्ण/सक्रिय ऊर्जा की प्रतीक) एक-दूसरे को लपेटते हुए ऊपर की ओर बढ़ती हैं — ठीक वैसे ही जैसे चिकित्सा-प्रतीक "कैड्यूसियस" में दो सर्प एक दंड के इर्द-गिर्द लिपटे दिखाए जाते हैं (यह समानता संयोग है या नहीं, इस पर विद्वानों में मतभेद है)।
मूलाधार में एक कुंडलिनी शक्ति — सर्पिणी रूप में कल्पित, साढ़े तीन कुंडलियों में लिपटी हुई — सुप्त अवस्था में स्थित मानी जाती है। कुंडलिनी शब्द संस्कृत के "कुंडल" (कुंडली, coil) से बना है। तंत्र-दर्शन के अनुसार, यह शक्ति ब्रह्मांडीय स्त्री-ऊर्जा (शक्ति/पार्वती तत्व) का व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व करती है, जबकि सहस्रार में शिव-तत्व (पुरुष, शुद्ध चेतना) निवास करता है। ध्यान, प्राणायाम, बंध, और मंत्र-जप के संयुक्त अभ्यास से यह शक्ति जागृत होकर सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए ऊपर की ओर यात्रा करती है, प्रत्येक चक्र को क्रमशः "भेदन" करती हुई, अंततः सहस्रार में शिव-शक्ति मिलन (कुछ ग्रंथों में इसे स्वयं शिव-पार्वती के दिव्य विवाह के रूपक से भी वर्णित किया गया है) को प्राप्त करती है — यही योग का परम लक्ष्य, कैवल्य या मोक्ष, माना जाता है।
सातों चक्रों की सूची — एक नज़र में
| क्रम | चक्र | स्थान | तत्व | पंखुड़ियां | बीज मंत्र | अधिष्ठाता देवता | शक्ति (देवी) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | मूलाधार | रीढ़ का आधार | पृथ्वी | 4 | लं | ब्रह्मा | डाकिनी |
| 2 | स्वाधिष्ठान | नाभि के नीचे | जल | 6 | वं | विष्णु | राकिनी |
| 3 | मणिपूर | नाभि/सौर जालक | अग्नि | 10 | रं | रुद्र | लाकिनी |
| 4 | अनाहत | हृदय | वायु | 12 | यं | ईश | काकिनी |
| 5 | विशुद्ध | कंठ | आकाश | 16 | हं | सदाशिव | शाकिनी |
| 6 | आज्ञा | भ्रूमध्य (तीसरी आंख) | मन (तत्वों से परे) | 2 | ॐ | परमशिव | हाकिनी |
| 7 | सहस्रार | सिर का ऊपरी भाग | तत्वों/जगत से परे | 1000 | — | — | — |
एक ज़रूरी स्पष्टीकरण: चक्रों को अक्सर अंतःस्रावी ग्रंथियों (endocrine glands) से जोड़ा जाता है — जैसे मूलाधार को अधिवृक्क ग्रंथि (adrenal), विशुद्ध को थायरॉइड से। यह जोड़ मूल संस्कृत ग्रंथों में नहीं मिलता — यह 20वीं सदी में थियोसॉफिकल लेखक सी.डब्ल्यू. लीडबीटर (C.W. Leadbeater) की 1927 की पुस्तक "The Chakras" से लोकप्रिय हुआ एक आधुनिक पश्चिमी पुनर्व्याख्या है। शास्त्रीय तंत्र ग्रंथों (जैसे "षट्चक्रनिरूपण") में चक्रों को स्थूल शरीर (भौतिक अंगों) का नहीं, बल्कि सूक्ष्म शरीर (subtle body) का हिस्सा माना गया है — यह श्रद्धा और योग-दर्शन का विषय है, शरीर-रचना विज्ञान (anatomy) का दावा नहीं।
प्रत्येक चक्र की सामान्य संरचना: पंचमहाभूत सिद्धांत से जुड़ाव
षट्चक्रनिरूपण में हर चक्र का वर्णन एक सुसंगत पैटर्न में किया गया है: एक विशिष्ट पंखुड़ी-संख्या वाला कमल (जिसकी पंखुड़ियों पर संस्कृत वर्णमाला के अक्षर अंकित होते हैं — कुल मिलाकर निचले छह चक्रों की पंखुड़ियां जोड़ने पर 50 होती हैं, जो संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों की कुल संख्या से मेल खाती है), एक ज्यामितीय यंत्र (तत्व का प्रतीक), एक बीज मंत्र, एक अधिष्ठाता देवता, एक शक्ति (देवी रूप), और एक प्रतीकात्मक वाहन/पशु। यह सुसंगत संरचना दिखाती है कि यह कोई बिखरी हुई लोक-मान्यता नहीं, बल्कि सांख्य दर्शन के पंचमहाभूत सिद्धांत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) पर आधारित एक सुव्यवस्थित दार्शनिक प्रणाली है। निचले पांच चक्र क्रमशः इन्हीं पांच तत्वों से जुड़े हैं, जबकि आज्ञा मन (मानस तत्व) और सहस्रार इन सबसे परे शुद्ध चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं — यह क्रम स्वयं स्थूल से सूक्ष्म की ओर आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है।
सप्त-चक्र संपूर्ण अनुसंधान श्रृंखला — प्रत्येक चक्र का गहन अध्ययन
इस शोध श्रृंखला के अंतर्गत अनुसूत्र ने प्रत्येक चक्र पर शास्त्रीय श्लोकों, यंत्र ज्यामिति, निर्देशित ध्यान विधियों और 21-दिवसीय साधना योजना के साथ प्रामाणिक ग्रंथ प्रकाशित किए हैं:
- मूलाधार चक्र (Muladhara Chakra) — पृथ्वी तत्व, लं बीज मंत्र, डाकिनी शक्ति, और अस्तित्व व स्थिरता की आध्यात्मिक नींव।
- स्वाधिष्ठान चक्र (Svadhisthana Chakra) — जल तत्व, वं बीज मंत्र, राकिनी शक्ति, अवचेतन संस्कारों की शुद्धि और सृजनात्मक ऊर्जा का रूपांतरण।
- मणिपूर चक्र (Manipura Chakra) — अग्नि तत्व, रं बीज मंत्र, लाकिनी शक्ति, समान वायु, उड्डियान बंध और अदम्य इच्छाशक्ति का केंद्र।
- अनाहत चक्र (Anahata Chakra) — वायु तत्व, यं बीज मंत्र, काकिनी शक्ति, विष्णु ग्रंथि भेदन, अनहद नाद और सार्वभौमिक करुणा का कमल।
- विशुद्ध चक्र (Vishuddha Chakra) — आकाश तत्व, हं बीज मंत्र, शाकिनी शक्ति, जालंधर बंध, खेचरी मुद्रा और वाक्-सिद्धि का केंद्र।
- आज्ञा चक्र (Ajna Chakra) — मनस्तत्व, ॐ बीज मंत्र, हाकिनी शक्ति, शाम्भवी मुद्रा, रुद्र ग्रंथि भेदन और तीसरी आंख की अंतर्दृष्टि।
- सहस्रार चक्र (Sahasrara Chakra) — तत्वातीत, सहस्र दल कमल, सोमरस-वर्षण, परम शिव-शक्ति सामरस्य और कैवल्य समाधि।
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आधुनिक पुनर्व्याख्या का इतिहास: ग्रंथियों से जोड़ कहां से आया?
आज बहुत-सी पुस्तकों और वेबसाइटों पर चक्रों को सीधे अंतःस्रावी ग्रंथियों (endocrine glands) से जोड़ा जाता है — मूलाधार को अधिवृक्क ग्रंथि (adrenal) से, स्वाधिष्ठान को जननांग ग्रंथियों से, मणिपूर को अग्न्याशय (pancreas) से, अनाहत को थाइमस से, विशुद्ध को थायरॉइड से, आज्ञा को पीनियल ग्रंथि से, और सहस्रार को पिट्यूटरी ग्रंथि से। यह इतना व्यापक रूप से दोहराया जाता है कि अक्सर इसे प्राचीन तथ्य मान लिया जाता है — पर तथ्य यह नहीं है।
यह विशिष्ट ग्रंथि-मानचित्रण मूल संस्कृत तंत्र ग्रंथों — षट्चक्रनिरूपण सहित — में कहीं नहीं मिलता। इसका सबसे स्पष्ट स्रोत थियोसॉफिकल सोसाइटी के लेखक चार्ल्स वेब्स्टर लीडबीटर (C. W. Leadbeater) की 1927 में प्रकाशित पुस्तक "द चक्राज़" (The Chakras) है, जिसमें उन्होंने अपने कथित "दिव्य-दृष्टि" (clairvoyant) अनुभवों के आधार पर चक्रों का वर्णन और भौतिक शरीर से जोड़ प्रस्तुत किया। बाद के दशकों में — विशेषकर 1970-80 के दशक के न्यू एज आंदोलन में — इस पुनर्व्याख्या को और विस्तार मिला और यह पश्चिमी योग-साहित्य का लगभग मानक हिस्सा बन गई। सर जॉन वुडरॉफ के मूल अनुवाद में स्वयं ऐसा कोई ग्रंथि-मानचित्रण नहीं है।
इसका यह अर्थ नहीं कि आधुनिक पुनर्व्याख्या "गलत" या बेकार है — यह एक अलग, बाद की व्याख्या-परत है, जिसे मूल शास्त्रीय प्रणाली से स्पष्ट रूप से अलग करके देखना ज़रूरी है, ताकि पाठक स्वयं तय कर सके कि वह किस स्तर की जानकारी पर भरोसा कर रहा है — प्राचीन शास्त्र, या 20वीं सदी की आध्यात्मिक पुनर्व्याख्या।
साधना पद्धति का अवलोकन: अष्टांग योग से जुड़ाव
चक्र-साधना को अक्सर अलग-थलग तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, पर परंपरागत रूप से यह महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग (जिसकी हमने अपनी योगसूत्र श्रृंखला में विस्तृत चर्चा की थी) के व्यापक ढांचे के भीतर ही समझी जाती है — यम-नियम (नैतिक आधार) के बिना केवल तकनीकी अभ्यास को परंपरा में अधूरा माना जाता है। हठयोग ग्रंथों में चक्र-जागरण के लिए मुख्यतः चार प्रकार के अभ्यास बताए गए हैं:
- आसन — शरीर को स्थिर और सक्षम बनाने के लिए, ताकि लंबे समय तक ध्यान में बैठा जा सके।
- प्राणायाम — विशेषकर नाड़ी-शोधन (अनुलोम-विलोम), जो इड़ा-पिंगला को संतुलित करने का प्रत्यक्ष अभ्यास माना जाता है।
- बंध — मूलबंध, उड्डियान बंध, और जालंधर बंध — शरीर के तीन प्रमुख ऊर्जा-द्वारों को "बंद" करने वाली हठयोग तकनीकें, जो कुंडलिनी को ऊपर की दिशा देने के लिए प्रयुक्त मानी जाती हैं।
- मंत्र-जप और ध्यान — प्रत्येक चक्र के बीज मंत्र का जप, साथ ही उसके यंत्र और देवता का दृश्यीकरण (visualization)।
सावधानियां: कुंडलिनी-जागरण को हल्के में न लें
षट्चक्रनिरूपण और अन्य तंत्र ग्रंथ बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कुंडलिनी-जागरण एक गहन और शक्तिशाली प्रक्रिया मानी जाती है, जिसे परंपरागत रूप से किसी अनुभवी गुरु के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में ही करने की सलाह दी जाती रही है — स्वयं इंटरनेट पर पढ़कर अनियंत्रित अभ्यास द्वारा नहीं। आधुनिक मनोविज्ञान में भी इससे मिलती-जुलती एक अवधारणा है — मनोचिकित्सक स्टानिस्लाव ग्रोफ़ और उनकी पत्नी क्रिस्टीना ग्रोफ़ ने 1980 के दशक में "स्पिरिचुअल इमरजेंसी" (spiritual emergency) शब्द गढ़ा, जो तीव्र ध्यान-अभ्यास या अनियंत्रित ऊर्जा-अनुभवों के बाद कुछ साधकों में देखी गई मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल की स्थिति को वर्णित करता है। यह किसी को डराने के लिए नहीं, बल्कि यह स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण है कि गहन ध्यान-साधना — चाहे वह किसी भी परंपरा की हो — सम्मान और उचित मार्गदर्शन की मांग करती है।
अन्य परंपराओं में ऊर्जा-केंद्रों की अवधारणा
चक्र जैसी अवधारणा केवल हिंदू तंत्र-योग परंपरा तक सीमित नहीं है। बौद्ध तंत्र (विशेषकर तिब्बती वज्रयान परंपरा) में भी चक्रों का वर्णन मिलता है, पर वहां आमतौर पर चार या पांच मुख्य चक्र (नाभि, हृदय, कंठ, मुकुट) माने जाते हैं, सात नहीं — और उनके प्रतीक, बीज अक्षर, और ध्यान-पद्धति हिंदू तंत्र से भिन्न हैं। कश्मीर शैव दर्शन में भी एक स्वतंत्र चक्र-प्रणाली विकसित हुई, जो अभिनवगुप्त जैसे आचार्यों के ग्रंथों में मिलती है। चीनी चिकित्सा-परंपरा (Traditional Chinese Medicine) में "दान तियेन" (dantian) नामक ऊर्जा-केंद्रों की अवधारणा है, जो चक्रों से मिलती-जुलती लगती है पर मेरिडियन-तंत्र (acupuncture channels) पर आधारित एक स्वतंत्र प्रणाली है, भारतीय नाड़ी-तंत्र से सीधे जुड़ी नहीं। यह विविधता दिखाती है कि "सूक्ष्म-शरीर में ऊर्जा-केंद्र" एक व्यापक मानवीय आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि हो सकती है, पर हर परंपरा की अपनी विशिष्ट, स्वतंत्र शब्दावली और प्रणाली है — इन्हें आपस में मिलाकर एक "सार्वभौमिक सत्य" के रूप में प्रस्तुत करना अकादमिक दृष्टि से सावधानी की मांग करता है।
प्रमुख संस्कृत शब्दावली — एक संक्षिप्त शब्दकोश
- नाड़ी (Nadi): सूक्ष्म शरीर में ऊर्जा-प्रवाह की वाहिका/चैनल। शारीरिक नस (nerve) का पर्यायवाची नहीं है, हालांकि अक्सर भ्रमवश ऐसा अनुवाद किया जाता है।
- प्राण (Prana): जीवन-ऊर्जा, जिसे नाड़ियों के माध्यम से प्रवाहित माना जाता है।
- बंध (Bandha): हठयोग की "ताला" तकनीकें, जो शरीर के विशिष्ट भागों को संकुचित कर ऊर्जा-प्रवाह को निर्देशित करती हैं।
- यंत्र (Yantra): किसी चक्र या देवता से जुड़ा ज्यामितीय प्रतीक, ध्यान में दृश्यीकरण के लिए प्रयुक्त।
- बीज मंत्र (Bija Mantra): एक-अक्षर वाला ध्वनि-मंत्र, जो किसी विशेष चक्र/तत्व के सार का प्रतीक माना जाता है।
- कैवल्य (Kaivalya): पतंजलि के योगसूत्र में वर्णित परम मुक्ति की अवस्था — पुरुष (चेतना) का प्रकृति से पूर्ण पृथक्करण।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या चक्र वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं? नहीं। चक्र सूक्ष्म शरीर की अवधारणा हैं, जो श्रद्धा, दर्शन, और ध्यान-अनुभव पर आधारित हैं — यह भौतिक शरीर-रचना विज्ञान (anatomy) का दावा नहीं है और न ही इसे उस रूप में प्रस्तुत करना उचित है।
क्या सभी योग-परंपराओं में सात ही चक्र माने जाते हैं? नहीं। विभिन्न तंत्र ग्रंथों में चक्रों की संख्या 5 से लेकर 9, 12, या इससे अधिक तक बताई गई है। सात-चक्र प्रणाली सबसे प्रचलित है, पर यह अकेली प्रणाली नहीं है।
क्या चक्र-ध्यान शुरू करने के लिए गुरु आवश्यक है? बुनियादी मंत्र-जप और सामान्य ध्यान के लिए नहीं, पर गहन कुंडलिनी-जागरण तकनीकों (विशेषकर बंध और तीव्र प्राणायाम) के लिए परंपरा स्पष्ट रूप से अनुभवी मार्गदर्शन की सलाह देती है।
निष्कर्ष
चक्र प्रणाली भारतीय योग-दर्शन का एक गहन, प्राचीन, और आंतरिक रूप से सुसंगत हिस्सा है — पर इसे समझने का सही तरीका यह है कि इसे सूक्ष्म शरीर के आध्यात्मिक मानचित्र के रूप में देखा जाए, न कि भौतिक शरीर-रचना के प्रतिस्थापन के रूप में। शास्त्रीय स्रोत (षट्चक्रनिरूपण, हठयोग ग्रंथ) और आधुनिक पुनर्व्याख्या (ग्रंथि-मानचित्रण, न्यू एज व्याख्याएं) — दोनों को स्पष्ट रूप से अलग रखकर ही इस ज्ञान का सम्मान और सही उपयोग संभव है। अगली कड़ी में हम मूलाधार चक्र — इस पूरी यात्रा के प्रथम पड़ाव — को विस्तार से समझेंगे।
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Written by Ravindra Valand
Founder and researcher at AnuSutra. Tracing ancient Sanskrit scriptures (Vedas, Upanishads, Bhagavad Gita) directly from canonical Sanskrit manuscripts, exploring the nexus between contemplative spiritual practices and modern cognitive science.
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