स्वाधिष्ठान चक्र: सृजनात्मकता, भावनात्मक शुद्धि और वासना-रूपांतरण का केंद्र | Svadhisthana — The Sacral Chakra
स्वाधिष्ठान चक्र — जल तत्व, वं बीज मंत्र, राकिनी शक्ति, षट्चक्रनिरूपण के शास्त्रीय श्लोक, 21-दिवसीय ध्यान विधि और अवचेतन संस्कारों की शुद्धि का प्रमाणिक विश्लेषण।

स्वाधिष्ठान चक्र का पारंपरिक यंत्र — छह पंखुड़ियों वाला सिंदूरी कमल और श्वेत अर्धचंद्र जल-यंत्र। (Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0, Zavatter)
यह हमारी सप्त-चक्र शोध श्रृंखला की दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी है (मूलाधार चक्र का संपूर्ण अध्ययन यहां पढ़ें एवं सप्तचक्र संपूर्ण मार्गदर्शिका देखें)।
संस्कृत व्याकरण के अनुसार "स्वाधिष्ठान" शब्द दो शब्दों के संधि-संयोग से निष्पन्न होता है — "स्व" (अर्थात आत्म, स्वयं की चेतना या परम सत्ता) और "अधिष्ठान" (अर्थात वास्तविक आधार, आसन या निवास-स्थान)। अतः स्वाधिष्ठान का शाब्दिक अर्थ है — "आत्मा का निजी अधिष्ठान"।
भौतिक शरीर में यह चक्र मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) के निचले भाग में, नाभि से ठीक दो अंगुल नीचे और त्रिकास्थि (Sacrum) के सम्मुख सूक्ष्म सुषुम्ना नाड़ी के भीतर अवस्थित माना जाता है। मूलाधार जहां पृथ्वी तत्व की दृढ़ता और जड़ता का प्रतीक है, वहीं स्वाधिष्ठान जल तत्व (Apas / Jala Tattva) का प्रादुर्भाव है — तरलता, गतिशीलता, काम-ऊर्जा (Eros), कामुकता, सृजनात्मक अभिव्यक्ति और अवचेतन संस्कारों (Karmic Imprints) का रहस्यमयी महासागर।
स्वाधिष्ठान का परिचय — एक नज़र में
| शास्त्रीय आयाम | तांत्रिक एवं दार्शनिक विवरण |
|---|---|
| संस्कृत नाम | स्वाधिष्ठान (Svādhiṣṭhāna) |
| शारीरिक अवस्थिति | नाभि से दो अंगुल नीचे, त्रिकास्थि (Sacrum) एवं जननांगों के पीछे मेरुदंडीय सुषुम्ना में |
| महाभूत (तत्व) | जल (Jala / Apas) — शीतलता, संवेदनशीलता और प्रवाहमयता |
| कमल दल (पंखुड़ियां) | 6 पंखुड़ियां — विद्युत वर्ण/सिंदूरी आभा (वर्मिलियन) |
| दल वर्ण (मातृकाएं) | बं, भं, मं, यं, रं, लं (स्वर्ण वर्ण के छह संस्कृत अक्षर) |
| बीज मंत्र | वं (VAṂ) — नासिका और नाद के साथ उच्चरित वरुण बीज |
| यंत्र ज्यामिति | श्वेत अर्धचंद्र (शुक्ल चंद्रमा का बिंब — जल और सोम रस का प्रतीक) |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान विष्णु (पीतांबरधारी, नील-मेघ वर्ण, चतुर्भुज — जगत के पालनकर्ता) |
| अधिष्ठात्री शक्ति | राकिनी (Rākiṇī — नील-पद्म वर्णा, द्विमुखी, त्रिशूल-कमल-बाण-खेट धारिणी) |
| प्रतीकात्मक वाहन | मकर (Makara — पौराणिक घड़ियाल/जल-दैत्य, अवचेतन वृत्तियों का प्रतीक) |
| संबंधित कोष | प्राणमय कोष (Pranamaya Kosha) एवं मनोमय कोष |
| ज्ञानेंद्रिय एवं कर्मेंद्रिय | रसना (स्वाद / जिह्वा) एवं उपस्थ (जननांग / प्रजनन तंत्र) |
| प्राण प्रवाह | अपान वायु (Apana Vayu) और व्यान का समन्वय |
तांत्रिक महत्व और षट्चक्रनिरूपण का शास्त्रीय वर्णन
मध्यकालीन नाथ और तांत्रिक साहित्य में पूर्णानंद स्वामी विरचित षट्चक्रनिरूपणम् (Ṣaṭ-Cakra-Nirūpaṇam) स्वाधिष्ठान चक्र का अत्यंत सूक्ष्म और काव्यात्मक विवरण प्रस्तुत करता है:
सिन्दूरपूररुचिराऽरुणपद्ममन्यत् सौषुम्णमध्यनिहितं द्युतिमत्सपत्रम् ।
बालाभिरर्कदलैररुणेर्लसन्तो वाद्यैः सबिन्दुभिरलम्बितषट्कवर्णैः ॥१४॥(भावार्थ: सुषुम्ना नाड़ी के मध्य में स्थित, सिंदूर के समान लाल-नारंगी चमक वाला छह पंखुड़ियों का एक अन्य श्रेष्ठ कमल है, जिसे स्वाधिष्ठान कहते हैं। इसके छह दलों पर बं से लेकर लं तक छह मातृका वर्ण बिंदु सहित देदीप्यमान हो रहे हैं।)
तंत्र ग्रंथ आगे स्पष्ट करते हैं कि इस चक्र के अंतर्गर्भ में वरुण-मंडल अवस्थित है, जो पूर्ण चंद्रमा की भांति धवल और शुद्ध जल का महासमुद्र है। षट्चक्रनिरूपण के श्लोक १६-१७ में देवी राकिनी और भगवान विष्णु का ध्यान इस प्रकार बताया गया है:
तस्यांके राकिणी सा निखिलसुखकरी नीलजीमूतकान्तिः ।
नानाकल्पोज्ज्वलाङ्गी करयुगलधृताभीतिमुद्राभिरामा ॥
राकिनी शक्ति यहां नीले मेघों जैसी आभा वाली, दिव्य आभूषणों से सुसज्जित और साधक को संपूर्ण सांसारिक व यौगिक सुख प्रदान करने वाली मानी गई हैं। उनके साथ विराजमान भगवान विष्णु इस बात का द्योतक हैं कि स्वाधिष्ठान जीवन के संतुलन, सृजन के संरक्षण और रस-रसिका के उत्कर्ष का केंद्र है।
मकर का रहस्य: अवचेतन मन और काम-ऊर्जा का प्रतीकवाद
स्वाधिष्ठान के यंत्र में जल-देवता वरुण के वाहन के रूप में "मकर" (Makara) चित्रित किया जाता है। हिंदू मूर्तिकला और आगम शास्त्रों में मकर केवल एक मगरमच्छ नहीं है; यह एक अत्यंत रहस्यमयी जलचर प्राणी है, जिसके जबड़े घड़ियाल जैसे, पूंछ मछली जैसी और पैर जल-जंतु जैसे होते हैं।
गहन योग-मनोविज्ञान में मकर निम्नलिखित तीन गहन सच्चाइयों का प्रतीक है:
- अगाध अवचेतन का भय: मगरमच्छ जल की अथाह गहराइयों में छिपा रहता है और अप्रत्याशित रूप से सतह पर आकर शिकार को खींच ले जाता है। इसी प्रकार, मनुष्य के दमित कामुक विचार, भय, यौन-कुंठाएं और वासनाएं अवचेतन मन की गहराइयों में छिपी रहती हैं।
- काम-शक्ति की दुर्जेय शक्ति: काम (Eros/Desire) संसार की सबसे शक्तिशाली प्रेरक ऊर्जा है। यदि साधक इस पर नियंत्रण न रखे, तो यह उसे वासना के गर्त में खींच लेती है; किंतु यदि इस मकर को साध लिया जाए, तो यह वरुण (विराट चेतना के रस) का वाहन बन जाता है।
- संस्कारों का भंडार (Karmic Reservoir): जन्म-जन्मांतर के संचित संस्कार इसी चक्र की तरंगों में संचित रहते हैं। जब कुंडलिनी मूलाधार से उठकर स्वाधिष्ठान में प्रवेश करती है, तो साधक का सामना अचानक तीव्र भावनाओं, अज्ञात आंसुओं, पुरानी स्मृतियों और कामुक स्वप्नों से होता है। इसे योग में "मकर-संक्रमण" कहा जाता है।
मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक पक्ष: युंग और आधुनिक योग-विज्ञान
स्विस मनोविश्लेषक कार्ल गुस्ताव युंग (C.G. Jung) ने 1932 में ज्यूरिख में आयोजित "द साइकोलॉजी ऑफ कुंडलिनी योग" व्याख्यानमाला में स्वाधिष्ठान का गहन विश्लेषण किया था। युंग के अनुसार:
"मूलाधार स्थूल, सचेतन, भौतिक संसार है जिसमें हम सामान्य रूप से जीते हैं। स्वाधिष्ठान में उतरना जल में बपतिस्मा लेने जैसा है — यह अवचेतन के विशाल, अंधेरे समुद्र में कूदना है जहां लेविआथन (मकर) रहता है। जो इस जल में डूबने से बच जाता है, वही वास्तव में आत्म-साक्षात्कार (Individuation) का अधिकारी बनता है।"
आधुनिक जीवन में स्वाधिष्ठान असंतुलन के लक्षण
| चक्र की स्थिति | मानसिक व भावनात्मक लक्षण | शारीरिक व व्यावहारिक लक्षण |
|---|---|---|
| अल्प-सक्रिय (Deficient) | सृजनात्मक शून्यता, संवेदनहीनता, संबंधों में भावनात्मक रूखापन, अवसाद, आनंद न ले पाना (Anhedonia) | कामेच्छा में अत्यधिक कमी, पेल्विक जकड़न, पीठ के निचले हिस्से में पुराना दर्द, गुर्दे/मूत्राशय में संवेदनशीलता |
| अति-सक्रिय (Excessive) | भावनात्मक अस्थिरता (Mood Swings), कामुक आसक्ति, वासना-लोलुपता, सीमाओं का अभाव, दूसरों पर भावनात्मक निर्भरता | यौन अति-सक्रियता, हार्मोनल असंतुलन, प्रजनन अंगों में तनाव, जल प्रतिधारण (Fluid Retention) |
| संतुलित (Balanced) | प्रचुर सृजनात्मकता, कलात्मक प्रवाह, स्वस्थ कामुकता, भावनात्मक परिपक्वता, दूसरों के प्रति सहानुभूति, परिस्थितियों के साथ अनुकूलन | लचीला शरीर, स्वस्थ प्रजनन स्वास्थ्य, संतुलित हार्मोन, शांत व आकर्षक व्यक्तित्व |
साधना पद्धतियां — विस्तृत यौगिक क्रियाएं
स्वाधिष्ठान को जागृत और संतुलित करने के लिए केवल कल्पना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए शास्त्रीय हठयोग के अंगों का क्रमबद्ध समन्वय अनिवार्य है।
१. प्रमुख आसन
- बद्ध कोणासन (Baddha Konasana / Butterfly Pose): पेल्विक क्षेत्र की संकुचित नाड़ियों को खोलता है और अपान वायु को अधोमुखी से ऊर्ध्वमुखी बनाता है।
- भुजंगासन (Bhujangasana / Cobra Pose): त्रिकास्थि (Sacrum) पर दबाव डालकर स्वाधिष्ठान के कशेरुका केंद्र को उत्तेजित करता है।
- उपविष्ट कोणासन (Upavistha Konasana): जांघों के भीतरी संयोजी ऊतकों (adductors) को खींचकर जल-तत्व के प्रवाह को सुगम करता है।
- आनंद बालासन (Happy Baby Pose): अवचेतन तनाव और पेल्विक जकड़न को तुरंत शिथिल करने वाला अभ्यास।
२. विशिष्ट मुद्राएं और बंध
- अश्विनी मुद्रा (Ashwini Mudra): गुदा की पेशियों का लयबद्ध आकुंचन और प्रसरण। यह मूलाधार और स्वाधिष्ठान के बीच ऊर्जा की कड़ी जोड़ता है।
- वरुण मुद्रा (Varuna Mudra): कनिष्ठा (छोटी उंगली) के अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से स्पर्श कराना। यह शरीर में जल तत्व और भावनात्मक रस को संतुलित करता है।
- वज्रोली मुद्रा (Vajroli Mudra - सूक्ष्म स्तर): मूत्र-मार्ग की पेशियों का हल्का संकोचन। यह वीर्य/रज की काम-शक्ति को ओजस (Ojas) में रूपांतरित करने का सर्वोच्च तांत्रिक अभ्यास है। (चेतावनी: इसका उग्र अभ्यास केवल सिद्ध गुरु के सान्निध्य में ही किया जाना चाहिए।)
३. प्राणायाम
- चंद्र भेदन प्राणायाम (Chandra Bhedana Pranayama): दाहिनी नासिका को बंद करके केवल बायीं नासिका (इड़ा नाड़ी) से श्वास लेना और दाहिनी से छोड़ना। यह जल तत्व की शीतलता और शांति को सक्रिय करता है।
- शीतली एवं सीत्कारी प्राणायाम: जिह्वा को मोड़कर श्वास लेना, जिससे तंत्रिका तंत्र में अमृत तत्व का संचार होता है।
विस्तृत निर्देशित ध्यान — चरण-दर-चरण (15-20 मिनट)
इस ध्यान अभ्यास को प्रातः काल या संध्या के समय खाली पेट करें। अपने निकट एक गिलास स्वच्छ जल रख सकते हैं।
चरण १: काय-स्थैर्य एवं पेल्विक विश्राम (३ मिनट)
सिद्धासन, पद्मासन या सुखासन में बैठें। रीढ़ सीधी रहे परंतु तनी हुई न हो। हथेलियों को वरुण मुद्रा में घुटनों पर रखें। आंखें कोमलता से बंद करें। ध्यान को नाभि से दो अंगुल नीचे पेल्विस और त्रिकास्थि के गहरे आंतरिक क्षेत्र में ले जाएं। अनुभव करें कि वहां जमा हुआ सारा दिनभर का तनाव पिघल रहा है।
चरण २: जल तत्व और श्वेत अर्धचंद्र का दर्शन (४ मिनट)
गहरा धीमा श्वास लें। कल्पना करें कि आपके स्वाधिष्ठान चक्र के केंद्र में एक अत्यंत निर्मल, शांत, पारदर्शी जल का महासरोवर है। उस जल की सतह पर पूर्ण चंद्रमा की धवल किरणों से बना एक चमकता हुआ श्वेत अर्धचंद्र (Crescent Moon) तैर रहा है। हर श्वास के साथ यह जल अत्यंत शीतल, पवित्र और अमृतमय बन रहा है।
चरण ३: छह पंखुड़ियों और मातृकाओं का स्पंदन (५ मिनट)
अब इस सरोवर के चारों ओर सिंदूरी/नारंगी रंग के छह कमल दलों को खिलते हुए देखें। इन दलों पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित अक्षरों का मानस स्मरण करें:
बं... भं... मं... यं... रं... लं...
अनुभव करें कि आपकी समस्त दमित भावनाएं, गिल्ट (अपराध-बोध) और भय इस पावन जल में विसर्जित होकर शुद्ध हो रहे हैं।
चरण ४: बीज मंत्र "वं" (VAM) का नाद-अनुसंधान (५ मिनट)
गहरा श्वास नाभि के नीचे भरें। श्वास छोड़ते हुए नाद ब्रह्म के साथ स्पष्ट ध्वनि में गुंजन करें:
"वँँँँँँ..." (VAAAAAAMMMMM...)
मंत्र की ध्वनि से पेल्विक गुहा में सूक्ष्म कंपन (Vibrations) उत्पन्न होने दें। ५ से ११ बार सस्वर जप करें, फिर मौन होकर चक्र में ध्वनि की गूंज का श्रवण करें।
चरण ५: विसर्जन एवं साक्षी भाव (३ मिनट)
धीरे-धीरे ध्यान को समूचे शरीर में फैलने दें। अनुभव करें कि आपके भीतर प्रेम, सृजनात्मकता और शांति का रस बह रहा है। हमारे प्राणायाम ब्रीद पेसर टूल की लय में लौटें। दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर आंखों पर रखें और धीरे से आंखें खोलें।
21-दिवसीय स्वाधिष्ठान साधना योजना (Practical Roadmap)
| चरण | अवधि | दैनिक अभ्यास | साधना का मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|---|
| चरण १: शुद्धि | दिवस १ से ७ | बद्ध कोणासन (५ मिनट) + वरुण मुद्रा में चंद्र भेदन (१० मिनट) + पर्याप्त जल सेवन | पेल्विक क्षेत्र की ग्रंथियों की शुद्धि, गिल्ट और भावनात्मक रुकावटों का निष्कासन |
| चरण २: सक्रियण | दिवस ८ से १४ | भुजंगासन + अश्विनी मुद्रा (२१ चक्र) + "वं" बीज मंत्र जप (१०८ बार) | काम-ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन, रचनात्मक प्रवाह की जागृति |
| चरण ३: रूपांतरण | दिवस १५ से २१ | पूर्ण १५-मिनट निर्देशित जल-ध्यान + सृजनात्मक अभिव्यक्ति (लेखन/कला) + मौन साधना | अवचेतन संस्कारों की शांति, काम को प्रेम व ओजस में बदलना |
सामान्य भ्रांतियां — तथ्य-जांच (Myth-Busting)
भ्रांति १: "स्वाधिष्ठान केवल काम-वासना (Sexuality) का केंद्र है।"
तथ्य: पाश्चात्य न्यू-एज साहित्य ने स्वाधिष्ठान को केवल सेक्सुअल चक्र के रूप में सीमित कर दिया है। प्राचीन भारतीय तंत्र में यह "संस्कार-बीज" का केंद्र है। यह जीवन के सौंदर्य, काव्य, संगीत, वैज्ञानिक नवाचार और ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम (भक्ति रस) का मूल स्रोत है। काम तो इस चक्र की ऊर्जा का केवल सबसे स्थूल बहिर्मुखी रूप है।
भ्रांति २: "नारंगी रंग का पत्थर या क्रिस्टल पहन लेने से स्वाधिष्ठान तुरंत खुल जाता है।"
तथ्य: पारंपरिक तंत्र ग्रंथों (जैसे कूर्मांचल तंत्र या षट्चक्रनिरूपण) में क्रिस्टल हीलिंग का कोई शास्त्रीय संदर्भ नहीं है। चक्र सूक्ष्म शरीर (Pranic Body) का हिस्सा हैं; वे अनुशासन, प्राणायाम, मंत्र जप और नैतिक शुद्धि (यम-नियम) से शुद्ध होते हैं, किसी बाह्य पत्थर के स्पर्श से नहीं।
भ्रांति ३: "स्वाधिष्ठान को जननांग ग्रंथियों (Gonads) का भौतिक पर्याय माना जा सकता है।"
तथ्य: यह 20वीं सदी के थियोसॉफिकल लेखकों (जैसे सी.डब्ल्यू. लीडबीटर) द्वारा दिया गया शारीरिक सरलीकरण है। भौतिक ग्रंथियां केवल स्थूल प्रतिरूप हैं, जबकि स्वाधिष्ठान चेतना का एक बहुआयामी सूक्ष्म भंवर है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्र. १: स्वाधिष्ठान चक्र का बीज मंत्र क्या है और इसे कैसे जपें?
स्वाधिष्ठान का बीज मंत्र "वं" (VAṂ) है। इसे नाभि से दो अंगुल नीचे त्रिकास्थि क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए जपा जाता है। जप करते समय होंठों और तालु में नासिका के अनुस्वार (Mmm) की कंपन का अनुभव करना चाहिए।
प्र. २: स्वाधिष्ठान चक्र कमजोर होने पर क्या लक्षण दिखाई देते हैं?
स्वाधिष्ठान कमजोर होने पर व्यक्ति भावनात्मक रूप से सुन्न महसूस करता है, जीवन में किसी भी कार्य में उत्साह या रस नहीं रहता, रचनात्मकता समाप्त हो जाती है और व्यक्ति हर समय एक अज्ञात अपराध-बोध (Guilt) में जीता है।
प्र. ३: क्या स्वाधिष्ठान साधना से कुंडलिनी सीधे जाग्रत हो जाती है?
नहीं। कुंडलिनी का मूल निवास मूलाधार चक्र है। स्वाधिष्ठान में कुंडलिनी तभी निर्भयता से प्रवेश करती है जब साधक का मूलाधार पूर्णतः दृढ़ और स्थिर हो चुका हो। मूलाधार की शुद्धि के बिना स्वाधिष्ठान पर ध्यान लगाने से अत्यधिक कामुक विचार या मानसिक चंचलता उत्पन्न हो सकती है।
प्र. ४: इस चक्र के अधिष्ठाता देवता भगवान विष्णु क्यों हैं?
सृष्टि के तीन मूल कार्य हैं — उत्पत्ति (ब्रह्मा - मूलाधार), पालन (विष्णु - स्वाधिष्ठान), और संहार (रुद्र - मणिपूर)। जल जीवन का संवर्धन और पोषण करता है। भगवान विष्णु जल में शेषनाग पर शयन करते हैं (क्षीरसागर), अतः वे जल-तत्व और जीवन-रस के परम रक्षक होने के कारण स्वाधिष्ठान के अधिष्ठाता हैं।
प्र. ५: स्वाधिष्ठान चक्र का परीक्षण स्वयं कैसे करें?
आप अपनी वर्तमान चक्र ऊर्जा स्थिति का वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन करने के लिए हमारे इंटरएक्टिव चक्र डायग्नोस्टिक टूल का उपयोग कर सकते हैं।
निष्कर्ष
स्वाधिष्ठान चक्र मानवीय चेतना की वह पवित्र प्रयोगशाला है जहां पाशविक वासना दैवीय प्रेम और कला में रूपांतरित होती है। जब तक जल का यह महासागर शांत और निर्मल नहीं होता, तब तक साधक अगले सोपान — मणिपूर चक्र की दिव्य अग्नि — का साक्षात्कार नहीं कर सकता।
अगली कड़ी पढ़ें: मणिपूर चक्र: आत्मबल, प्राण-अग्नि और इच्छाशक्ति का केंद्र
पिछली कड़ी पढ़ें: मूलाधार चक्र: आधार चक्र का संपूर्ण ज्ञान
Assess Your Subtle Energy & Chakra Alignment
Take our 10-question diagnostic based on classical Shat-Chakra-Nirupana texts to assess active vs blocked pranic energy centers.

Written by Ravindra Valand
Founder and researcher at AnuSutra. Tracing ancient Sanskrit scriptures (Vedas, Upanishads, Bhagavad Gita) directly from canonical Sanskrit manuscripts, exploring the nexus between contemplative spiritual practices and modern cognitive science.
Related Sacred Studies

सहस्रार चक्र: कैवल्य, समाधि, अमृत-वर्षण और परम शिव-शक्ति मिलन | Sahasrara — The Crown Chakra
सहस्रार चक्र — सहस्र दल कमल, ब्रह्मरंध्र, सोमरस वर्षण, षट्चक्रनिरूपण के श्लोक, परम शिव-शक्ति सामरस्य और निर्विकल्प समाधि के सर्वोच्च योग विज्ञान का प्रामाणिक विश्लेषण।

आज्ञा चक्र: अंतर्दृष्टि, विवेक, रुद्र ग्रंथि भेदन और तीसरी आंख का रहस्य | Ajna — The Third Eye Chakra
आज्ञा चक्र — मनस्तत्व, ॐ बीज मंत्र, हाकिनी शक्ति, षट्चक्रनिरूपण के श्लोक, शाम्भवी मुद्रा, रुद्र ग्रंथि भेदन और अंतर्दृष्टि के प्रामाणिक योग विज्ञान का संपूर्ण विश्लेषण।

विशुद्ध चक्र: अभिव्यक्ति, सत्य, अमृत-पान और आकाश-तत्व का केंद्र | Vishuddha — The Throat Chakra
विशुद्ध चक्र — आकाश तत्व, हं बीज मंत्र, शाकिनी शक्ति, षट्चक्रनिरूपण के श्लोक, जालंधर बंध, खेचरी मुद्रा और अमृत-शुद्धि के प्रामाणिक योग विज्ञान का संपूर्ण विश्लेषण।